दिल्ली DU प्रदर्शन: कचौड़ी-समोसा नारे से क्यों उठा महिला सुरक्षा का सवाल?

दिल्ली के कालकाजी स्थित आस्था कुंज पार्क में 21 सितंबर 2026 को 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित गैंगरेप की घटना के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं ने ‘हम औरतें आजाद हैं’ के बैनर तले मार्च निकाले। प्रदर्शन में ‘एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा’ जैसे व्यंग्यात्मक नारे सोशल मीडिया पर वायरल हुए। छात्राओं की मुख्य मांग बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग, पुलिस गश्त, CCTV और अपराधियों पर कार्रवाई है, न कि महिलाओं पर पाबंदियां।
एक कचौड़ी दो समोसा... दिल्ली में क्यों गूंजा यह नारा?
नई दिल्ली / 03 अक्टूबर 2026 / अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के कालकाजी स्थित आस्था कुंज पार्क में 21 सितंबर को 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं ने महिला सुरक्षा को लेकर विरोध-प्रदर्शन किए। ‘हम औरतें आजाद हैं’ के बैनर और व्यंग्यात्मक नारों के जरिए छात्राओं ने सुरक्षा के लिए महिलाओं की आवाजाही सीमित करने के बजाय बेहतर रोशनी, CCTV, पुलिस गश्त और अपराधियों पर कार्रवाई की मांग उठाई। घटना के बाद DDA के 736 पार्कों के सुरक्षा ऑडिट में भी सार्वजनिक जगहों की सुरक्षा से जुड़ी गंभीर कमियां सामने आई हैं।
दिल्ली की सड़कों पर पिछले कुछ दिनों से एक ऐसा नारा सुनाई दे रहा है, जो पहली नजर में मजाकिया लगता है, लेकिन उसके पीछे महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गहरी बेचैनी छिपी है—“एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा।” दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं के प्रदर्शनों से जुड़ा यह नारा सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आया। इसके साथ कई दूसरे व्यंग्यात्मक नारे भी लगाए गए, जिनका उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा को लेकर समाज और प्रशासन का ध्यान खींचना बताया गया।
इस विरोध की पृष्ठभूमि 21 सितंबर 2026 को कालकाजी के आस्था कुंज पार्क में हुई उस घटना से जुड़ी है, जिसमें पुलिस के अनुसार 17 वर्षीय लड़की के साथ तीन लोगों ने कथित तौर पर सामूहिक दुष्कर्म किया। रिपोर्टों के मुताबिक लड़की अपने एक पुरुष मित्र के साथ कालकाजी मंदिर जाने के बाद पार्क में गई थी। आरोप है कि तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर दोनों को रोका और हथियारों के बल पर उन्हें अलग किया।
दिल्ली पुलिस ने घटना के बाद तीन आरोपियों—आसिफ, हेमंत और मुकेश—को गिरफ्तार किया। पुलिस के मुताबिक आरोपियों तक पहुंचने में CCTV फुटेज और तकनीकी जांच से मदद मिली। एक आरोपी आसिफ के साथ पुलिस की मुठभेड़ भी हुई, जिसमें उसके पैर में गोली लगी। मामले में POCSO Act और भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है।
मामले की जांच आगे बढ़ने के साथ पीड़िता ने जेल में हुई Test Identification Parade के दौरान तीनों आरोपियों की पहचान भी की है। पुलिस ने कथित घटना में इस्तेमाल हथियार बरामद करने और फोरेंसिक जांच की प्रक्रिया की जानकारी दी है। हालांकि, किसी भी आरोपी के खिलाफ आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं और अंतिम फैसला अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होगा।
घटना ने सिर्फ अपराध नहीं, सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए
आस्था कुंज पार्क करीब 142 एकड़ में फैला बड़ा सार्वजनिक पार्क है। घटना के बाद सामने आई रिपोर्टों में पार्क के भीतर पर्याप्त निगरानी, रोशनी और गश्त से जुड़े सवाल उठे। स्थानीय स्तर पर पार्क के कुछ हिस्सों के सुनसान और कम रोशनी वाले होने की बात भी रिपोर्ट हुई। एक रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय लोगों ने आरोपियों में से एक को पहले भी कथित तौर पर जोड़ों को परेशान करते और चाकू रखते हुए देखा था, हालांकि इस संबंध में पहले कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं हुई थी।
यही वह बिंदु है जहां छात्राओं का विरोध केवल एक आपराधिक घटना तक सीमित नहीं रह जाता। उनका सवाल है कि अगर किसी सार्वजनिक पार्क में पर्याप्त रोशनी, निगरानी और नियमित पुलिस गश्त हो तो क्या अपराधियों के लिए ऐसी जगहों को निशाना बनाना मुश्किल नहीं होगा? इस तर्क के साथ प्रदर्शनकारी महिलाओं की गतिविधियों पर रोक लगाने के बजाय सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित बनाने की मांग कर रही हैं।

‘हम औरतें आजाद हैं’ के पीछे क्या संदेश है?
दिल्ली विश्वविद्यालय के अलग-अलग कॉलेजों की छात्राओं ने महिला सुरक्षा के सवाल पर मार्च निकाले। रिपोर्टों के मुताबिक लेडी श्रीराम कॉलेज, मिरांडा हाउस, गार्गी कॉलेज और अन्य संस्थानों की छात्राएं प्रदर्शनों में शामिल हुईं। दक्षिणी दिल्ली में हुए मार्चों में बड़ी संख्या में महिला छात्राओं ने हिस्सा लिया और सार्वजनिक जगहों को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने की मांग उठाई।
प्रदर्शन का एक प्रमुख संदेश था—“हम औरतें आजाद हैं।” इसके साथ “आजादी”, “डर के आगे आजादी” और महिलाओं को घर या हॉस्टल में सीमित करने के बजाय अपराधियों पर कार्रवाई जैसे संदेश वाले पोस्टर दिखाई दिए। छात्राओं का कहना था कि सुरक्षा का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि लड़कियां शाम के बाद बाहर न निकलें, पार्क में न जाएं या अपने कपड़ों और व्यवहार को लेकर लगातार सफाई देती रहें।
इसी सोच से जुड़े कुछ नारे सोशल मीडिया पर वायरल हुए। “एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा”, “एक सुट्टा दो चाय, मर्द जात हाय हाय” और “रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं” जैसे नारों ने प्रदर्शन को अलग पहचान दी। कुछ लोगों ने इन नारों के लहजे पर सवाल उठाए, जबकि प्रदर्शन से जुड़े लोगों का कहना है कि व्यंग्य के जरिए वे अपनी नाराजगी और असुरक्षा को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाना चाहती हैं।
असली सवाल: महिलाओं को रोकना या सार्वजनिक जगहें सुरक्षित करना?
महिला सुरक्षा की बहस में लंबे समय से एक सवाल मौजूद रहा है—क्या समाधान महिलाओं की आवाजाही सीमित करना है या ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें वे बिना डर के सार्वजनिक स्थानों का इस्तेमाल कर सकें?
दिल्ली की छात्राओं की मांगों का जोर दूसरे विकल्प पर है। वे स्ट्रीट लाइटिंग, CCTV, पुलिस गश्त, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन और शिकायतों पर तेज कार्रवाई की मांग कर रही हैं। उनके पोस्टरों और नारों में यह संदेश भी सामने आया कि किसी अपराध के बाद लड़की की गतिविधियों, कपड़ों या समय को सवालों के घेरे में रखने के बजाय अपराधी और सुरक्षा व्यवस्था की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
इस बहस को आस्था कुंज मामले के बाद सामने आए DDA के सुरक्षा ऑडिट ने भी नया आधार दिया है। DDA ने दिल्ली के अपने 736 पार्कों का ऑडिट किया। रिपोर्ट के मुताबिक केवल 16 पार्कों में CCTV कैमरे काम कर रहे थे, यानी करीब 2 प्रतिशत पार्कों में ही यह निगरानी व्यवस्था उपलब्ध मिली। 190 पार्कों को हाई-रिस्क, 258 को मीडियम-रिस्क और 288 को लो-रिस्क श्रेणी में रखा गया।
ऑडिट में 520 पार्कों में अतिरिक्त प्रकाश व्यवस्था की जरूरत भी सामने आई। DDA ने हाई-रिस्क पार्कों में तत्काल सुधार की बात कही है। 323 पार्कों में अतिरिक्त CCTV कवरेज की जरूरत बताई गई है और 190 हाई-रिस्क पार्कों में बाइक पेट्रोलिंग शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है।
ये आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि महिला सुरक्षा की बहस केवल कानून और सजा तक सीमित नहीं है। यदि सार्वजनिक स्थान पर पर्याप्त रोशनी नहीं है, CCTV नहीं है, प्रवेश-निकास नियंत्रित नहीं है और नियमित निगरानी नहीं है तो अपराध होने से पहले रोकथाम की व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है।
दिल्ली पुलिस भी अब छात्राओं से पूछ रही है—कहां असुरक्षित महसूस करती हैं?
घटना के बाद दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा को लेकर सामुदायिक स्तर पर संवाद बढ़ाया है। 2 अक्टूबर को दक्षिण कैंपस में पुलिस अधिकारियों ने छात्रों के साथ पैदल मार्च किया और उनसे पूछा कि वे किन रास्तों या इलाकों में खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। पुलिस ने खास तौर पर अंधेरे, सुनसान और कम आवाजाही वाले रास्तों की पहचान करने की कोशिश की।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी शहर की सुरक्षा केवल पुलिस थाने या मुख्य सड़कों तक सीमित नहीं होती। छात्राओं के लिए मेट्रो स्टेशन से कॉलेज, कॉलेज से PG या हॉस्टल और वहां से बाजार तक जाने वाला रास्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अगर इनमें से कोई हिस्सा अंधेरा या सुनसान है तो वहां नियमित निगरानी की जरूरत पड़ती है।
दिल्ली विश्वविद्यालय क्षेत्र में बड़ी संख्या में देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्राएं पढ़ने आती हैं। परिवारों की चिंता भी इसी वजह से बढ़ती है कि महानगर में पढ़ने वाली बेटी देर शाम किस रास्ते से लौट रही है। छात्राओं का कहना है कि सुरक्षा का स्थायी समाधान यह नहीं हो सकता कि उन्हें हर समय किसी के साथ चलने या अपनी गतिविधियां सीमित करने की सलाह दी जाए।
2012 के बाद भी क्यों लौटता है वही सवाल?
महिला सुरक्षा की राष्ट्रीय बहस में 16 दिसंबर 2012 की दिल्ली घटना एक बड़ा मोड़ थी। उसके बाद आपराधिक कानून में महत्वपूर्ण बदलाव हुए और यौन अपराधों को लेकर देशव्यापी चर्चा हुई। लेकिन एक दशक से अधिक समय बाद भी दिल्ली और दूसरे शहरों में सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा का सवाल बार-बार सामने आता है।
यही कारण है कि हाल के प्रदर्शनों में 2012 का संदर्भ भी दिखाई दिया। कुछ पोस्टरों में यह सवाल उठाया गया कि इतने वर्षों बाद भी महिलाओं को रात में सड़क, पार्क या सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते समय डर क्यों महसूस होता है।
कानून बनाना जरूरी है, लेकिन कानून के साथ उसकी जमीन पर मौजूद व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। पुलिस की मौजूदगी, त्वरित प्रतिक्रिया, अच्छी रोशनी, CCTV, सुरक्षित परिवहन, शिकायतों पर कार्रवाई और पीड़ितों को संस्थागत सहायता—ये सभी एक साथ काम करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की नजर में भी मामला पहुंचा
दिल्ली-NCR में हालिया बलात्कार की घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2026 को स्वतः संज्ञान वाली कार्यवाही दर्ज की। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर मामला “In Re: Recent Rape Incidents in Delhi NCR” के नाम से दर्ज है। इससे यह स्पष्ट है कि घटनाओं को लेकर न्यायपालिका के स्तर पर भी संस्थागत चिंता सामने आई है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सुनवाई के दौरान जवाबदेही और कानून-व्यवस्था से जुड़े सवालों पर ध्यान दिया गया। ऐसे मामलों में न्यायिक निगरानी का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि पीड़ित को न्याय दिलाने के साथ-साथ भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए संस्थागत कमियों की पहचान भी जरूरी है।
नारे वायरल हुए, लेकिन सवाल उससे बड़ा है
“एक कचौड़ी दो समोसा...” वाला नारा सोशल मीडिया पर भले ही मजाकिया अंदाज में वायरल हुआ हो, लेकिन उसके पीछे छात्राओं की गंभीर चिंता है। वे जिस भाषा का इस्तेमाल कर रही हैं, उसमें गुस्सा, व्यंग्य और विरोध तीनों मौजूद हैं।
इस नारे पर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाया कि बेटियों को ऐसा नारा लगाने की नौबत क्यों आई और महिला सुरक्षा तथा सम्मान को लेकर समाज को आत्ममंथन करना चाहिए।
हालांकि, किसी भी व्यंग्यात्मक नारे को पूरी समस्या का प्रतिनिधि मान लेना उचित नहीं होगा। सभी पुरुषों को अपराधी मानना भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ, कुछ नारों की भाषा को देखकर मूल मुद्दे—महिलाओं की सुरक्षा और सार्वजनिक स्थानों की जवाबदेही—को नजरअंदाज करना भी बहस को अधूरा कर देगा।
अब आगे क्या?
आस्था कुंज की घटना के बाद सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि सामने आए सुरक्षा ऑडिट और छात्राओं की मांगों का जमीन पर कितना असर दिखाई देता है। सिर्फ CCTV लगाने की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। कैमरे काम कर रहे हैं या नहीं, फुटेज की निगरानी कौन करता है और घटना के समय पुलिस कितनी जल्दी पहुंचती है—इन सवालों का भी जवाब जरूरी है।
इसी तरह स्ट्रीट लाइट लगाने के बाद उनका रखरखाव भी जरूरी है। पार्कों में प्रवेश और निकास व्यवस्था, झाड़ियों और अंधेरे हिस्सों की सफाई, सुरक्षा गार्डों की मौजूदगी, नियमित पेट्रोलिंग और स्थानीय लोगों के साथ पुलिस संवाद को एक संयुक्त सुरक्षा व्यवस्था के रूप में देखना होगा।
छात्राओं की मांगों का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा शिकायत व्यवस्था से जुड़ा है। कॉलेजों में Internal Complaints Committees को सक्रिय, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाना जरूरी है। छात्राओं को यह भरोसा होना चाहिए कि शिकायत करने पर उनकी बात सुनी जाएगी और शिकायत करने की वजह से उन्हें किसी तरह का नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा।
आस्था कुंज पार्क की घटना ने एक अपराध की जांच से कहीं बड़ा सवाल खड़ा किया है—दिल्ली जैसे महानगर में सार्वजनिक स्थान आखिर किसके लिए सुरक्षित हैं? अगर किसी लड़की को पार्क, सड़क या कॉलेज से घर लौटते समय अपने रास्ते और समय को लेकर लगातार डरना पड़े तो शहर की सुरक्षा व्यवस्था की सफलता को केवल अपराध दर्ज होने या गिरफ्तारी की संख्या से नहीं मापा जा सकता।
पुलिस ने इस मामले में तेजी से कार्रवाई करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया, जांच आगे बढ़ी और DDA ने पार्कों का सुरक्षा ऑडिट भी कराया। ये कार्रवाई महत्वपूर्ण हैं। लेकिन अब असली परीक्षा उन सुधारों की है जो घटना के बाद घोषित किए गए हैं।
दिल्ली की छात्राएं जिस बात पर जोर दे रही हैं, वह मूल रूप से सरल है—उन्हें सुरक्षित रहने के लिए कम आजादी नहीं, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान चाहिए। बेहतर रोशनी, CCTV, पुलिस गश्त, सुरक्षित परिवहन और जवाबदेह व्यवस्था किसी एक वर्ग की नहीं, पूरे शहर की जरूरत है।
और शायद यही वजह है कि व्यंग्य में कहा गया “एक कचौड़ी दो समोसा...” वाला नारा इतनी तेजी से लोगों तक पहुंचा। नारे की भाषा पर बहस हो सकती है, लेकिन उसके पीछे उठे सवाल को नजरअंदाज करना मुश्किल है—महिलाओं को सुरक्षित रखने का रास्ता उनकी आजादी कम करना है या उन जगहों को सुरक्षित बनाना, जहां वे आजादी से चलना चाहती हैं?