धरती का बदलता चेहरा और घटती जगह: जलवायु संकट बना भारत में मानवीय विस्थापन का सबसे बड़ा कारण

धरती का बदलता चेहरा और घटती जगह: जलवायु संकट बना भारत में मानवीय विस्थापन का सबसे बड़ा कारण

धरती का बदलता चेहरा और आदमी की घटती जगह एक गंभीर मानवीय संकट बनता जा रहा है। जब मौसम घर छीन लेता है और सरकार नाम भी नहीं देती, तब हालात और अधिक गंभीर हो जाते हैं। जलवायु संकट अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर एक मानवीय संकट बन चुका है। बाढ़ आती है तो सिर्फ घर नहीं बहते, बल्कि लोगों की पूरी जिंदगी बह जाती है। सूखा पड़ता है तो खेतों के साथ-साथ लोगों की उम्मीदें भी दरकने लगती हैं। गर्मी जब देह को झुलसा देती है, तब मजदूर के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि वह परिवार के लिए रोटी कमाए या अपनी जान बचाए। भारत में मौसम अब सीधे तौर पर विस्थापन का कारण बन चुका है। यह लोगों के घर और रोजगार छीनकर लाखों नागरिकों को अपना ठिकाना बदलने के लिए मजबूर कर रहा है।

जलवायु संकट और आंतरिक विस्थापन के आंकड़े

वर्ष 2024 में देश भर में आपदाओं के कारण करीब 54 लाख आंतरिक विस्थापन दर्ज किए गए थे। यह आंकड़ा साल 2012 के बाद सबसे ऊंचा आंकड़ा था, जिसमें से करीब दो-तिहाई मामले केवल बाढ़ से जुड़े हुए थे। इसके बाद वर्ष 2025 में यह संख्या 6.72 लाख दर्ज की गई, लेकिन इसके बाद भी संकट थमा नहीं। भारत इस दौरान भी दुनिया के सर्वाधिक आपदा-विस्थापन वाले देशों में शामिल रहा है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि प्रकृति ने जिन लोगों को उनके घरों से बेदखल किया है, नीति निर्माताओं ने उन्हें अब तक कोई स्पष्ट पहचान नहीं दी है। यही हमारी सरकारी नीति का सबसे बड़ा और चिंताजनक विरोधाभास बना हुआ है।

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नीतिगत कमियां और जलवायु प्रवासी की अनदेखी

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तमाम मिशन चल रहे हैं, आपदा प्रबंधन की संस्थाएं हैं और राहत-पुनर्वास के प्रावधान भी मौजूद हैं। लेकिन इसके बावजूद सरकारी व्यवस्था में ‘जलवायु प्रवासी’ की कोई भी स्पष्ट नीति-श्रेणी दर्ज नहीं है। घर छोड़ने वाले व्यक्ति को आपदा-पीड़ित कहा जाता है, शहर जाने वाले को आर्थिक प्रवासी और खेत छोड़ने वाले को ग्रामीण प्रवासी माना जाता है। लेकिन आधिकारिक तौर पर यह कहीं भी दर्ज नहीं होता कि उसे घर से किसने निकाला है, जो कि असल में बदलता हुआ मौसम है। सुंदरबन के द्वीप समुद्र के बढ़ते जलस्तर और कटाव के कारण लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं। घोरामाड़ा इसका सबसे सटीक उदाहरण है, जहां जमीन का गायब होना जीवन के आधार खिसकने का बड़ा संकट बन चुका है।

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और मजदूरों पर मार

भारत का प्रवास संकट बहुत विराट है और विभिन्न अध्ययनों में देश के आंतरिक प्रवासियों की संख्या करीब 40 करोड़ आँकी गई है। इनमें से एक बहुत बड़ी संख्या उस अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ी है जो शहरों की बड़ी इमारतें और सड़कें बनाती है। यह श्रमबल सामान ढोता है, घर चलाता है और खेतों में फसल उगाने का काम करता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश का करीब 90 प्रतिशत श्रमबल अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। इनकी मजदूरी पहले से ही काफी अस्थिर होती है और अब मौसम ने इस अनिश्चितता को और अधिक बढ़ा दिया है। जब गर्मी बढ़ती है, तब काम के घंटे घट जाते हैं, बीमारी तेजी से फैलती है और कुल आय में भारी गिरावट आती है।

गर्मी का प्रकोप और आर्थिक नुकसान

गर्मी की असली मार कभी भी थर्मामीटर में नहीं बल्कि सीधे मजदूर की जेब में साफ दिखाई देती है। वर्ष 2026 में अप्रैल और मई के महीनों के दौरान देश के कई हिस्सों में तापमान लगातार 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया। बांदा में तापमान 47.6 डिग्री तक और दिल्ली में 43 से 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। निर्माण मजदूर, ईंट-भट्ठे के श्रमिक, रिक्शा चालक और सड़क किनारे सामान बेचने वाले विक्रेताओं के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ जैसा कोई विकल्प नहीं होता है। जब तक वे धूप में बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक उनके घर का चूल्हा नहीं जल सकता है। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के वर्ष 2026 के एक अध्ययन के अनुसार, अत्यधिक गर्मी के कारण अनौपचारिक श्रमिक साल में 15 से 24 दिन तक काम खो सकते हैं।

नीतियों की अनदेखी और मणिपुर का उदाहरण

नीति और हकीकत के बीच की यह खाई लगातार दिखाई देती है, लेकिन इसके बावजूद यह भर नहीं पा रही है। वर्ष 2025 में इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स द्वारा राष्ट्रीय, राज्य और शहर स्तर की 94 नीतियों व हस्तक्षेपों की समीक्षा की गई थी। इस समीक्षा में यह पाया गया कि 94 में से 73 हस्तक्षेप यानी करीब 78 प्रतिशत नीतियां जलवायु के लिहाज से पूरी तरह अंधी थीं। दूसरी ओर, मणिपुर की कहानी बिल्कुल अलग कारण से महत्वपूर्ण बनी हुई है क्योंकि वहां विस्थापन जलवायु के कारण नहीं बल्कि हिंसा की वजह से हुआ है। आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र के अनुसार वर्ष 2025 के अंत तक मणिपुर में करीब 78 हजार लोग अब भी आंतरिक विस्थापन का जीवन जीने को मजबूर थे।

आंकड़ों की धुंधलाहट और नीतिगत सुधार की मांग

सरकारी आंकड़े कई बार सच को पूरी तरह सामने नहीं लाते बल्कि उसे छिपा देते हैं। जनगणना में देरी और विभिन्न विभागों की अलग-अलग परिभाषाएं प्रवास की इस पूरी तस्वीर को और अधिक धुंधला कर देती हैं। सरकारी आंकड़ों में प्रवासी के बारे में सिर्फ यह दर्ज होता है कि वह व्यक्ति ‘कहाँ से आया’ और ‘कहाँ गया’, लेकिन वह ‘क्यों गया’ यह कभी दर्ज नहीं होता। यदि प्रवास का कारण ही दर्ज नहीं किया जाएगा तो जलवायु की भूमिका हमेशा अदृश्य बनी रहेगी। अब देश को दया की नहीं बल्कि एक मजबूत नीति की सख्त जरूरत है। ‘जलवायु प्रवासी’ को आधिकारिक पहचान मिलनी चाहिए और बाढ़, समुद्री कटाव व सूखे से उजड़े परिवारों का स्थाई पुनर्वास होना चाहिए।

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