बिजनौर में कमलनाथ के पिता की जमीन पर कब्जा, चौंकाने वाला खुलासा

मुख्य कड़ियां:
- कागजी जादूगरी (जिंदा बनाम मृत): महेंद्रनाथ की वास्तविक मृत्यु 7 सितंबर 2004 (दिल्ली) में हुई थी, जबकि धोखाधड़ी के लिए फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र में मृत्यु की तारीख 10 अप्रैल 2003 दर्शा दी गई। यानी इंसान बाद में दुनिया से गया और कागजों में पहले ही विदा कर दिया गया!
- फर्जी वसीयत का खेल: पहले मालिक को कागजों में मृत घोषित किया गया, फिर उसके नाम की वसीयत तैयार कर जमीन पर दावेदारी ठोक दी गई।
- खुलासा कैसे हुआ? जब 18 मई 2026 को कमलनाथ की ओर से पिता की विरासत दर्ज कराने हेतु नजीबाबाद तहसील में आवेदन दिया गया, तब राजस्व रिकॉर्ड खंगालने पर इस पूरे विवादित फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ हुआ।
- कार्रवाई: पुलिस ने इस मामले में धर्मपाल सिंह, जसबिंदर सिंह ढिल्लों, विजय शंकर पांडेय और स्थानीय लेखपाल डेविड कुमार के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की है। इनमें से धर्मपाल और विजय शंकर को गिरफ्तार किया जा चुका है।
हड़पने वालों का माल भी किसी ने हड़प लिया!*
साहब, जमीन बड़ी अजीब चीज है। जिसके पास होती है, वह उसे बचाने में जिंदगी लगा देता है और जिसके पास नहीं होती, वह उसे हड़पने के रास्ते खोजता रहता है। लेकिन बिजनौर की कहानी तो उससे भी एक कदम आगे निकल गई। यहां खबर यह नहीं है कि जमीन हड़पने की कोशिश हुई, असली मजा तो यह है कि जमीन हड़पने के लिए पहले मालिक को ही कागजों में मरवा दिया गया!
उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले की नजीबाबाद तहसील के अमीखानपुर गांव में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता कमलनाथ के पिता महेंद्रनाथ की जमीन से जुड़ा मामला सामने आया है। पुलिस के अनुसार महेंद्रनाथ के नाम करीब 90 बीघा कृषि भूमि है। इनमें से करीब 26 बीघा जमीन पर कथित तौर पर कब्जा जमाने के लिए ऐसी वसीयत और मृत्यु प्रमाणपत्र सामने आए, जिनकी सत्यता अब पुलिस जांच रही है। अब जरा खेल समझिए।
जिस आदमी की जमीन है, उसकी मृत्यु 7 सितंबर 2004 को दिल्ली में हुई बताई गई है, लेकिन कथित मृत्यु प्रमाणपत्र में उसकी मृत्यु 10 अप्रैल 2003 दिखाई गई। यानी आदमी बाद में मरा और कागजों में पहले ही मर गया! यह हमारे देश की कागजी व्यवस्था का कमाल नहीं तो और क्या है?
जिंदा आदमी को कागज पर मृत कर दो, फिर उसके नाम वसीयत निकालो और उसके बाद उसकी जमीन पर अपना दावा ठोक दो। मतलब जमीन कब्जाने का ऐसा फार्मूला कि आदमी अदालत में जाकर भी कहे “हुजूर, पहले मुझे जिंदा तो साबित कर दीजिए!”
मामला तब खुला जब कमलनाथ की ओर से 18 मई 2026 को अपने पिता की जमीन की विरासत अपने नाम दर्ज कराने के लिए नजीबाबाद तहसील में आवेदन किया गया। राजस्व रिकॉर्ड में जमीन विवादित मिली और तहसीलदार के यहां पहले से चल रहे मामले का पता चला। इसके बाद कथित वसीयत और मृत्यु प्रमाणपत्र सामने आए।
पुलिस के मुताबिक इस मामले में धर्मपाल सिंह, जसबिंदर सिंह ढिल्लों, विजय शंकर पांडेय और लेखपाल डेविड कुमार के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। धर्मपाल सिंह और विजय शंकर पांडेय को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि अन्य आरोपियों की तलाश और भूमिका की जांच जारी है।
अब सवाल यह है कि अगर आरोप सही साबित होते हैं तो जमीन हड़पने वालों ने यह मान कैसे लिया कि इतने बड़े आदमी की जमीन का रिकॉर्ड कोई कभी देखेगा ही नहीं?
या फिर उन्हें व्यवस्था पर इतना भरोसा था कि कागजों में किसी को भी कभी भी जिंदा या मुर्दा बनाया जा सकता है?यही तो असली सवाल है।
क्योंकि यह मामला केवल कमलनाथ या उनके परिवार की जमीन का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें किसी जमीन के मालिकाना हक को साबित करने वाले दस्तावेज ही कथित तौर पर सवालों के घेरे में आ जाएं। अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु की तारीख सरकारी दस्तावेज में कुछ और और वास्तविक रिकॉर्ड में कुछ और हो सकती है, तो फिर आम आदमी अपने खेत, मकान और पुश्तैनी जमीन के कागजों को लेकर कितना निश्चिंत रहे?
आज कमलनाथ का नाम सामने आया है तो मामला सुर्खियों में है। कल यही खेल किसी ऐसे किसान के साथ हो सकता है जिसके पास न दिल्ली का अस्पताल रिकॉर्ड है, न बड़े वकील हैं और न ही पुलिस-प्रशासन तक सीधे पहुंच।
गरीब किसान के मामले में तो शायद उसकी जमीन पहले कागजों में जाती है, फिर तहसील में जाती है और आखिर में उसे पता चलता है कि जमीन तो बहुत पहले किसी और की हो चुकी है।
इस कहानी में एक और दिलचस्प पहलू है। कथित वसीयत के जरिए जमीन पर दावा किया गया और उसी विवाद के दौरान कथित मृत्यु प्रमाणपत्र भी सामने आया। पुलिस अब यह जांच रही है कि ये दस्तावेज कैसे तैयार हुए, किसने तैयार किए और राजस्व रिकॉर्ड में इनका इस्तेमाल किस तरह किया गया। पुलिस यह भी देख रही है कि इसमें नामजद लोगों के अलावा कोई और व्यक्ति शामिल था या नहीं।
यानी कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। फिलहाल दो लोग गिरफ्तार हैं। कुछ लोग फरार बताए जा रहे हैं। दस्तावेज जांच के घेरे में हैं और जमीन के रिकॉर्ड भी खंगाले जा रहे हैं।
लेकिन व्यंग्य की बात यह है कि जमीन हड़पने निकले लोगों ने शायद सोचा होगा कि मालिक दूर है, जमीन बंटाई पर है, रिकॉर्ड संभालने वाला कोई नहीं है और कागज अपने हिसाब से बना दिए जाएंगे। लेकिन साहब, इस बार हड़पने वालों का माल ही किसी और ने हड़पने की कोशिश कर दी!
कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि जमीन चाहे किसी बड़े आदमी की हो या किसी छोटे किसान की, जमीन के कागजों में एक गलत तारीख पूरी कहानी बदल सकती है। एक फर्जी दस्तावेज किसी को मालिक और असली मालिक को बेगाना बनाने की कोशिश कर सकता है। इसलिए असली सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि 26 बीघा जमीन किसने हड़पने की कोशिश की।
असली सवाल यह होना चाहिए कि कागज किसने बनाए, रिकॉर्ड किसने देखा, वसीयत किसने स्वीकार की, मृत्यु प्रमाणपत्र कैसे जारी हुआ और सरकारी रिकॉर्ड में इन दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर हुई?
क्योंकि जमीन हड़पने वाला अकेला नहीं होता। जमीन हड़पने की कहानी तब बनती है जब कहीं न कहीं कोई कागज चलता है, कोई दस्तखत होता है, कोई रिकॉर्ड बनता है और कोई व्यवस्था उस पर आंख बंद करके भरोसा करती है।
और अगर पुलिस की जांच में यह पूरा आरोप सही साबित होता है, तो यह सिर्फ 26 बीघा जमीन की कहानी नहीं होगी।यह उस कागजी तंत्र की कहानी होगी जहां जमीन हड़पने के लिए पहले मालिक को कागजों में हड़पना पड़ता है।
फिर भी साहब, एक बात तो माननी पड़ेगी जमीन हड़पने निकले थे…लेकिन इस बार हड़पने वालों का माल भी किसी ने हड़पने की कोशिश कर दी!

व्यंग्यात्मक टिप्पणी - राजेन्द्र सिंह जादौन