भोपाल मास्टर प्लान 2047: 21 साल बाद नक्शा, पर असली सवाल क्या?

Atal Hind Team Online27 September 20267 min read138 viewsमध्यप्रदेश
भोपाल मास्टर प्लान 2047: 21 साल बाद नक्शा, पर असली सवाल क्या?

21 साल तक भोपाल का मास्टर प्लान सोया रहा, अब 2047 का नक्शा लेकर सरकार आई सवाल यह है कि विकास होगा या जमीन का नया खेल?

भोपाल। राजधानी भोपाल के भविष्य का नक्शा आखिर 21 साल बाद फिर मेज पर आया है। सरकार मास्टर प्लान-2047 को विकास की नई तस्वीर बता रही है, लेकिन इस तस्वीर के पीछे सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब भोपाल को दशकों पहले नियोजित विकास की जरूरत थी, तब सरकारें सोती क्यों रहीं और अब जब शहर बेतरतीब निर्माण, ट्रैफिक, पार्किंग, जलभराव और जमीन के दबाव से जूझ रहा है, तो 2047 का सपना दिखाने की तैयारी क्यों हो रही है?

मास्टर प्लान कोई सामान्य सरकारी कागज नहीं होता। इसी दस्तावेज से तय होता है कि आने वाले वर्षों में कौन-सी जमीन आवासीय होगी, कहां बाजार बनेगा, कहां उद्योग होंगे, कहां सड़क निकलेगी, कहां हरित क्षेत्र रहेगा और किस इलाके में कितनी ऊंची इमारत खड़ी हो सकेगी। इसलिए भोपाल का नया मास्टर प्लान केवल नक्शा नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों की जमीन, घर और शहर का भविष्य तय करने वाला दस्तावेज है।

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उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रस्तावित मास्टर प्लान-2047 में लगभग 1,017 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र और 254 गांवों को शामिल किया जाना है। मेट्रो कॉरिडोर के आसपास 15 मंजिल तक भवन निर्माण का प्रस्ताव सामने आया है। रहवासी क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों को सड़क की चौड़ाई से जोड़ने की तैयारी है और 18 मीटर से कम चौड़ी सड़कों वाले इलाकों में कारोबार पर रोक जैसे प्रावधान प्रस्तावित बताए जा रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है कि जिस सरकार के सामने आज मास्टर प्लान लागू करने की चुनौती है, वह पहले यह जवाब दे कि पुराना प्लान आखिर जमीन पर कितना लागू हुआ?

कैग की रिपोर्ट ने मध्यप्रदेश की टाउन एंड कंट्री प्लानिंग व्यवस्था में कई कमियों की ओर ध्यान दिलाया है। भोपाल विकास योजना 2005 में जिन छह सड़कों के चौड़ीकरण का प्रस्ताव था, वे काम नहीं होने के कारण बाद के ड्राफ्ट में भी दोबारा प्रस्तावित करनी पड़ीं। यानी नक्शे पर सड़क बनती रही और जमीन पर रास्ता इंतजार करता रहा।

यही भोपाल की असली समस्या है। यहां प्लान बनाना मुश्किल नहीं, प्लान लागू करना मुश्किल है।

अब सरकार 2047 की बात कर रही है। लेकिन राजधानी के नागरिक पूछ रहे हैं कि क्या सरकार यह भी बताएगी कि पिछले मास्टर प्लान के कितने प्रावधान लागू हुए, कितनी प्रस्तावित सड़कें बनीं, कितने पार्क विकसित हुए, कितने सार्वजनिक संस्थानों के लिए जमीन सुरक्षित रखी गई और कितने क्षेत्रों में घोषित भू-उपयोग का पालन हुआ?

जब किसी क्षेत्र का भू-उपयोग बदलता है तो जमीन की कीमत और उसका भविष्य दोनों बदल जाते हैं। यदि कृषि भूमि आवासीय क्षेत्र बनती है तो उसकी कीमत में भारी अंतर आ सकता है। यदि किसी क्षेत्र को व्यावसायिक उपयोग की अनुमति मिलती है तो वहां जमीन का आर्थिक महत्व बदल जाता है। इसलिए मास्टर प्लान की हर लाइन के पीछे करोड़ों-अरबों रुपये के जमीन संबंधी हित जुड़े हो सकते हैं।

ऐसे में सरकार को केवल मास्टर प्लान जारी करने से काम नहीं चलेगा। उसे यह भी सार्वजनिक करना होगा कि प्रस्तावित भू-उपयोग परिवर्तन से किन-किन गांवों और क्षेत्रों पर असर पड़ेगा। कौन-सी जमीन आवासीय होगी, कौन-सी व्यावसायिक, कौन-सी औद्योगिक और कौन-सी कृषि या हरित क्षेत्र में रहेगी इसकी जानकारी आम नागरिक को आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए।

254 गांवों को योजना क्षेत्र में शामिल करना अपने आप में बहुत बड़ा फैसला है। आज जो गांव हैं, कल वे भोपाल के शहरी विस्तार का हिस्सा हो सकते हैं। वहां सड़क, पानी, सीवर, स्कूल, अस्पताल और सार्वजनिक परिवहन की जरूरत होगी। लेकिन यदि पहले जमीन का उपयोग बदला और बाद में बुनियादी सुविधाओं के बारे में सोचा गया तो आज की अनियोजित कॉलोनियां कल के नए संकट में बदल सकती हैं।

मेट्रो के आसपास 15 मंजिल तक भवन निर्माण की प्रस्तावित व्यवस्था भी सरकार से कई सवाल पूछती है। ऊंची इमारतें केवल मंजिलों से नहीं बनतीं। उनके लिए पर्याप्त पानी चाहिए, सीवर चाहिए, बिजली चाहिए, पार्किंग चाहिए, फायर सेफ्टी चाहिए और सबसे जरूरी सड़क की क्षमता चाहिए। यदि मेट्रो के आसपास ऊंची इमारतों की अनुमति दी जाती है तो सरकार को साथ में यह भी बताना होगा कि उस अतिरिक्त आबादी और यातायात का भार उठाने के लिए आधारभूत ढांचा कैसे तैयार होगा।

दूसरी तरफ रहवासी इलाकों में कारोबार को लेकर वर्तमान विवाद ने सरकार की योजना पर और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर 2026 को सरकार को नया ड्राफ्ट मास्टर प्लान प्रकाशित करने की अनुमति दी, लेकिन अंतिम प्रकाशन/कार्यान्वयन पर न्यायालय की भूमिका बरकरार रखी। वहीं अदालत के निर्देशों के अनुसार फिलहाल व्यावसायिक संपत्तियों की वैधता मौजूदा मास्टर प्लान और लागू भवन नियमों के आधार पर परखी जानी है।

यानी नई योजना आने की तैयारी है, लेकिन पुरानी व्यवस्था अभी लागू है। यही संक्रमण भोपाल के हजारों व्यापारियों और रहवासियों के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि पिछले वर्षों में जिन इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां चलती रहीं, वहां जिम्मेदारी केवल नागरिक की है या उन विभागों की भी जिन्होंने निर्माण अनुमति दी, नक्शे पास किए, बिजली-पानी के कनेक्शन दिए और वर्षों तक कारोबार चलता देखा?

अगर कोई दुकान नियम विरुद्ध बनी थी तो वह एक दिन में तो नहीं बनी होगी। निर्माण के समय अधिकारी कहां थे? नक्शा पास करते समय क्या जांच हुई? उपयोग परिवर्तन कब हुआ? नगर निगम ने कार्रवाई क्यों नहीं की? और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ तो इतने वर्षों तक व्यवस्था किसके भरोसे चलती रही?

यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि मास्टर प्लान की सफलता केवल नए नक्शे से नहीं बल्कि जवाबदेही की पुरानी व्यवस्था को ठीक करने से होगी।

भोपाल झीलों का शहर है। उसकी पहचान बड़े भवनों से ज्यादा उसकी झीलों, पहाड़ियों, हरियाली और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था से है। इसलिए 2047 के मास्टर प्लान में यदि विकास की रफ्तार बढ़ती है तो पर्यावरण की सुरक्षा उससे भी मजबूत होनी चाहिए। प्राकृतिक नालों, कैचमेंट क्षेत्रों और हरित क्षेत्रों के साथ समझौता करके बनाया गया कोई भी विकास मॉडल लंबे समय में शहर पर भारी पड़ सकता है।

सरकार को यह भी बताना होगा कि 1,017 वर्ग किलोमीटर के इस विस्तारित क्षेत्र में पानी कहां से आएगा, सीवर व्यवस्था कैसे बनेगी, बारिश का पानी कहां जाएगा और नई कॉलोनियों तक सार्वजनिक परिवहन कैसे पहुंचेगा।

भोपाल को सिर्फ फैलाना विकास नहीं है। भोपाल को व्यवस्थित करना विकास है।

21 साल का इंतजार अपने आप में सरकारों की कार्यप्रणाली पर सवाल है। अब सरकार के पास मौका है कि वह इस बार मास्टर प्लान को बंद कमरों का दस्तावेज न बनाए। हर नक्शा सार्वजनिक हो, हर भू-उपयोग स्पष्ट हो, हर आपत्ति का जवाब दिया जाए और यह बताया जाए कि किस इलाके के लिए सरकार ने अगले 20 वर्षों में क्या योजना बनाई है।

सबसे अहम बात मास्टर प्लान किसी बिल्डर, भूमाफिया, कारोबारी या सरकार के लिए नहीं बल्कि नागरिकों के लिए होना चाहिए।

सरकार यदि सचमुच भोपाल को 2047 का आधुनिक शहर बनाना चाहती है तो उसे पहले 2005 से 2026 तक का हिसाब देना चाहिए। कौन-सी योजना बनी, कौन-सी जमीन आरक्षित हुई, कौन-सी सड़क बनी, कौन-सा पार्क विकसित हुआ और कौन-सा प्रावधान कागज से बाहर नहीं निकल पाया।

क्योंकि भोपाल की जनता को अब एक और खूबसूरत नक्शा नहीं चाहिए। उसे ऐसा शहर चाहिए जहां सड़क नक्शे पर नहीं जमीन पर हो, पार्क फाइल में नहीं मैदान में हो, नाला नक्शे से गायब न हो, झील पर दबाव न हो और विकास का लाभ सिर्फ जमीन की कीमत बढ़ने वालों को नहीं बल्कि उस शहर में रहने वाले आम नागरिक को मिले।

21 साल बाद मास्टर प्लान आया है। अब सवाल सरकार से सिर्फ इतना है 2047 का भोपाल किसके लिए बनाया जा रहा है?

अगर इसका जवाब जनता के सामने साफ, पारदर्शी और दस्तावेजों के साथ आता है तो मास्टर प्लान विकास की शुरुआत बन सकता है। लेकिन यदि नक्शे के पीछे जमीन के उपयोग, निर्माण और कीमतों से जुड़े फैसलों की जानकारी अस्पष्ट रही, तो सवाल उठते रहेंगे कि यह भोपाल के भविष्य का मास्टर प्लान है या भविष्य की जमीन का नया हिसाब-किताब।

लेखक -राजेन्द्र सिंह जादौन
लेखक -राजेन्द्र सिंह जादौन
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