अम्बाला हादसा: धूलकोट में गिरा 4 मंजिला लैंटर, 4 की मौत!

विवार दोपहर अम्बाला-चंडीगढ़ मार्ग पर स्थित धूलकोट में एक निर्माणाधीन चार मंजिला इमारत का लैंटर डालते समय भीषण हादसा हो गया। चौथी मंजिल का लैंटर गिरते ही ताश के पत्तों की तरह निचली मंजिलें भी ढह गईं, जिससे 45 से अधिक मजदूर मलबे में दब गए। इस हादसे में अब तक 4 मजदूरों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि पुलिस और एनडीआरएफ की टीमें राहत कार्य में जुटी हुई हैं।
अम्बाला से अटल हिन्द सहयोगी पूर्ण सिंह की रिपोर्ट
अम्बाला में भरभराकर ढही 4 मंजिला इमारत: धूलकोट में चीख-पुकार के बीच ढहा कंक्रीट का पहाड़
रविवार की दोपहर अम्बाला-चंडीगढ़ मुख्य मार्ग पर स्थित धूलकोट इलाके के लिए एक खौफनाक मंजर लेकर आई। रोजाना की तरह दर्जनों मजदूर एक निर्माणाधीन चार मंजिला इमारत में कंक्रीट का लैंटर डालने के काम में व्यस्त थे। किसी को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि जिस छत को वे अपने पसीने से सींच रहे हैं, वही उनके लिए मौत का आशियाना बन जाएगी। अचानक एक जोरदार धमाके के साथ इमारत की चौथी मंजिल का लैंटर ढह गया और देखते ही देखते पूरी इमारत मलबे के ढेर में तब्दील हो गई।
जैसे ही चौथी मंजिल की स्लैब नीचे गिरी, उसने अपने वजन से तीसरी, दूसरी और पहली मंजिल के ढांचे को भी पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। एक के बाद एक गिरती छतों और कंक्रीट के मलबे ने नीचे और ऊपर काम कर रहे लगभग 45 मजदूरों को संभलने का एक मौका तक नहीं दिया। पूरी इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई और चारों तरफ धूल का गुबार तथा चीख-पुकार मच गई। आसपास मौजूद स्थानीय लोग और राहगीर तुरंत मौके की ओर दौड़े, लेकिन मलबा इतना भारी था कि बिना भारी मशीनों के किसी को निकालना असंभव था।

घटना की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय निवासियों ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम और फायर ब्रिगेड को सूचित किया। सूचना मिलते ही अम्बाला जिला प्रशासन, पुलिस बल, अग्निशमन विभाग और आपदा प्रबंधन की टीमें बचाव उपकरणों व जेसीबी मशीनों के साथ मौके पर पहुँचीं। मलबे के नीचे दबे मजदूरों को बाहर निकालने के लिए युद्धस्तर पर राहत और बचाव कार्य शुरू किया गया। शुरुआती घंटों में मलबे से निकाले गए कई मजदूरों को तुरंत एम्बुलेंस के माध्यम से अम्बाला के सिविल अस्पताल पहुंचाया गया।
अम्बाला के सिविल अस्पताल के डॉक्टरों ने जांच के बाद 4 मजदूरों को मृत घोषित कर दिया, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल मजदूरों का आपातकालीन वार्ड में इलाज चल रहा है। प्रत्यक्षदर्शियों और राहत कर्मियों के अनुसार, अभी भी कई मजदूरों के भारी मलबे और लोहे के गाडर/सरियों के बीच फंसे होने की आशंका है। कटर और क्रेन की मदद से स्लैब को काट-काटकर हटाया जा रहा है ताकि अंतिम व्यक्ति तक सुरक्षित पहुँचा जा सके।
कैसे हुआ दर्दनाक हादसा? डोमिनो प्रभाव ने छीनी मजदूरों की सांसें
घटनास्थल पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दोपहर के समय चौथी मंजिल पर कंक्रीट की ढलाई का काम अपने अंतिम चरण में था। लगभग 45 से 50 मजदूर अलग-अलग मंजिलों और छत पर गारा, सरिया और सीमेंट का मिश्रण पहुंचाने में लगे हुए थे। अचानक शटरिंग (सहायक लकड़ी और लोहे के खंभों) के डगमगाने की आवाज आई और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, पूरी चौथी मंजिल नीचे की तरफ आ गिरी।
इंजीनियरिंग की भाषा में इसे 'डोमिनो इफेक्ट' कहा जाता है, जहाँ एक ऊपरी संरचना का भारी भार सहने में असफल होने पर निचली कच्ची संरचनाएं भी क्रमबद्ध तरीके से ध्वस्त हो जाती हैं। चूंकि इमारत नई बन रही थी और नीचे की मंजिलों की शटरिंग और कंक्रीट भी पूरी तरह से पकी (Curing) नहीं थी, इसलिए चौथी मंजिल के अचानक गिरे सैकड़ों टन वजनी मलबे को निचली छतें संभाल नहीं सकीं। परिणाम यह हुआ कि पूरी इमारत एक के बाद एक ढहती चली गई।

मलबे के विशाल ढेर में बदले इस ढांचे के नीचे दबे मजदूरों को सांस लेने तक की जगह नहीं मिल पा रही थी। कंक्रीट के भारी गाटर, सीमेंट की सिल्लियां और शटरिंग में प्रयुक्त लोहे के पाइप मजदूरों पर जा गिरे। कई मजदूर मलबे के सबसे निचले हिस्से में दब गए, जिन्हें निकालने के लिए क्रेन और कंक्रीट कटर का सहारा लेना पड़ा। स्थानीय लोगों ने भी पुलिस का हाथ बटाते हुए हाथों से मलबा हटाने का प्रयास किया।
राहत कार्य में जुटी टीमों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि कच्चा मलबा बार-बार खिसक रहा था। जेसीबी मशीनों को सावधानीपूर्वक चलाना पड़ रहा था ताकि मलबे के अंदर जीवित बचे लोगों को कोई अतिरिक्त चोट न पहुंचे। बचाव कर्मियों ने स्निफर डॉग्स और थर्मल इमेजिंग कैमरों की मदद से मलबे के भीतर दबे लोगों की स्थिति का पता लगाने का प्रयास जारी रखा है।
राहत और बचाव कार्य का आंखों देखा हाल: प्रशासन अलर्ट मोड पर
हादसे की खबर फैलते ही अम्बाला के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, जिनमें उपायुक्त (DC), पुलिस अधीक्षक (SP) और उपमंडलाधीश (SDM) शामिल हैं, दल-बल के साथ घटनास्थल पर पहुंचे। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए पूरे अम्बाला-चंडीगढ़ रोड के एक हिस्से को ट्रैफिक के लिए डाइवर्ट कर दिया गया ताकि एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ बिना किसी रुकावट के आ-जा सकें। अस्पताल में भी रेड अलर्ट जारी कर अतिरिक्त डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई गई।
प्रशासनिक अधिकारियों ने तुरंत एनडीआरएफ (National Disaster Response Force) की नजदीकी बटालियन से भी संपर्क साधा और विशेष रेस्क्यू टीम को बुलवाया। एनडीआरएफ के जवानों ने आधुनिक कटिंग टूल्स और हाइड्रोलिक जैक की मदद से मलबे को हटाने का काम तेज किया। मलबे के भीतर से अब तक एक दर्जन से अधिक घायलों को सकुशल निकालकर अस्पताल भेजा जा चुका है, जिनमें से तीन की हालत बेहद नाजुक बताई जा रही है।
सिविल अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने बताया कि अस्पताल में लाए गए घायलों में अधिकांश को सिर, रीढ़ की हड्डी और पसलियों में गंभीर चोटें आई हैं। मृतकों के शवों को शवगृह में रखवा दिया गया है और उनके परिजनों को सूचित करने का प्रयास किया जा रहा है। अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि घायलों के इलाज में किसी भी प्रकार की लापरवाही या दवाओं की कमी न होने दी जाए।
घटनास्थल पर एकत्र हुए परिजनों और साथी मजदूरों का रो-रोकर बुरा हाल है। कई मजदूर अपने साथियों के नाम पुकारते हुए मलबे के आसपास भटकते दिखे। राहत कार्य में जुटी पुलिस टीम लगातार माइक के जरिए लोगों से दूरी बनाए रखने की अपील कर रही है ताकि रेस्क्यू ऑपरेशन में कोई बाधा उत्पन्न न हो और मशीनरी आसानी से काम कर सके।
क्या निर्माण मानकों की अनदेखी बनी हादसों की वजह? उठ रहे गंभीर सवाल
इस भयावह हादसे ने एक बार फिर व्यावसायिक और आवासीय भवनों के निर्माण में बरती जाने वाली घोर लापरवाही और सुरक्षा मानकों के उल्लंघन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शुरुआती जांच और स्थानीय लोगों के दावों के अनुसार, इमारत के निर्माण में प्रयुक्त सामग्री की गुणवत्ता और शटरिंग के मजबूत सपोर्ट को लेकर कई खामियां प्रथम दृष्टया नजर आ रही हैं। इतनी ऊंची इमारत पर लैंटर डालते समय जो तकनीकी सावधानियां बरती जानी चाहिए थीं, उनका अभाव दिखा।
भवन निर्माण से जुड़े जानकारों का मानना है कि चार मंजिला इमारत में शटरिंग का संतुलन बिगड़ने का सबसे बड़ा कारण कमजोर सपोर्ट या जरूरत से ज्यादा लोड हो सकता है। अक्सर ठेकेदार और बिल्डर लागत बचाने या काम जल्दी निपटाने के चक्कर में घटिया शटरिंग सामग्री का इस्तेमाल करते हैं या फिर नीचे की मंजिलों की कंक्रीट को पूरी तरह से सूखने (Set) दिए बिना ही ऊपर की मंजिलों का निर्माण शुरू कर देते हैं, जो एक बड़ा सुरक्षा जोखिम है।
इसके अतिरिक्त, क्या इस चार मंजिला व्यावसायिक इमारत का नक्शा नगर निगम या संबंधित प्रशासनिक प्राधिकरण से विधिवत स्वीकृत (Approved) था या नहीं, इसकी भी जांच शुरू हो गई है। शहरी स्थानीय निकायों के नियमों के अनुसार, किसी भी बहुमंजिला इमारत के निर्माण के लिए स्ट्रक्चरल सेफ्टी सर्टिफिकेट (संरचनात्मक सुरक्षा प्रमाण पत्र) अनिवार्य होता है। यदि बिना स्वीकृति या मानकों के विपरीत निर्माण किया जा रहा था, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक निगरानी की विफलता को भी दर्शाता है।
श्रम विभाग (Labour Department) के नियमों के तहत भी निर्माण स्थलों पर मजदूरों की सुरक्षा के लिए हेलमेट, सेफ्टी बेल्ट और नेट (सुरक्षा जाल) का होना अनिवार्य है। धूलकोट हादसे में घायल मजदूरों के अनुसार, काम के दौरान उन्हें किसी भी प्रकार के सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराए गए थे। यदि सुरक्षा जाल लगा होता तो ऊपरी मंजिल से गिरते समय मजदूरों की जान बचने की संभावना काफी अधिक होती।
कानूनी कार्रवाई और सरकारी मुआवजा: दोषियों पर कस सकता है शिकंजा
अम्बाला पुलिस और जिला प्रशासन ने इस पूरे मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि राहत एवं बचाव कार्य पूरा होने के तुरंत बाद इमारत के मालिक, बिल्डर, ठेकेदार और स्ट्रक्चरल इंजीनियर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सुसंगत धाराओं, जिसमें लापरवाही से मौत (Culpable Homicide Not Amounting to Murder) और मानव जीवन को खतरे में डालने से जुड़ी धाराएं शामिल हैं, के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाएगी।
राज्य सरकार और जिला प्रशासन की ओर से मृतकों के परिवारों और घायलों के लिए आर्थिक सहायता और मुआवजे की घोषणा की प्रक्रिया जारी है। श्रम कल्याण बोर्ड के नियमों के तहत पंजीकृत मजदूरों को आपदा और दुर्घटना की स्थिति में वित्तीय सहायता प्रदान करने का कानूनी प्रावधान है। इसके साथ ही प्रशासन ने यह सुनिश्चित करने की बात कही है कि दोषी ठेकेदार और भवन मालिक से पीड़ितों के लिए उचित मुआवजे की वसूली की जाए।
जिला प्रशासन ने मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति के गठन के निर्देश दिए हैं। इस समिति में पीडब्ल्यूडी (PWD) के वरिष्ठ अभियंता, नगर निगम के अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी शामिल होंगे। यह समिति निर्माण सामग्री के सैंपल की जांच करेगी, शटरिंग की विफलता के कारणों का विश्लेषण करेगी और 7 दिनों के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके आधार पर आगे की कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई तय होगी।
यह घटना केवल अम्बाला के लिए नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक चेतावनी है कि बिना कड़े सुरक्षा मानकों और तकनीकी ऑडिट के किए जा रहे अवैध व असुरक्षित निर्माण किस प्रकार निर्दोष मजदूरों की बलि ले रहे हैं। जब तक निर्माण स्थलों पर सुरक्षा और गुणवत्ता के कड़े नियम सख्ती से लागू नहीं किए जाएंगे, तब तक ऐसे हादसों पर रोक लगाना बेहद मुश्किल होगा।