कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार से बढ़ रही है पर्यावरण और संसाधनों की चिंता

कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज मानव जीवन के हर क्षेत्र में तेजी से फैल रही है। इसके पीछे आंकड़ा केंद्र काम करते हैं जहां सर्वर चौबीसों घंटे चलते हैं। भारत में आंकड़ा केंद्रों की क्षमता तेजी से बढ़ रही है जिससे पानी और बिजली की खपत बढ़ रही है।
भारत में आंकड़ा केंद्रों का बढ़ता दायरा और पानी की खपत
भारत में आंकड़ा केंद्रों की स्थापित क्षमता वर्ष 2020 में लगभग 520 मेगावाट थी जो वर्ष 2025 के मध्य तक लगभग 1.5 गीगावाट पहुंच गई। विभिन्न आकलनों के अनुसार वर्ष 2030 तक यह क्षमता लगभग 4.5 से 6.5 गीगावाट तक पहुंच सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल सेवाओं के विस्तार के कारण यह वृद्धि हो रही है। ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद के एक अध्ययन के अनुसार भारत में आंकड़ा केंद्रों में वर्ष 2025 के दौरान लगभग 150 अरब लीटर पानी के वार्षिक उपयोग का अनुमान है। वर्ष 2030 तक यह मात्रा दोगुने से अधिक हो सकती है।
भूमि और कृषि क्षेत्रों पर पड़ता दबाव
आंकड़ा केंद्रों के विस्तार के लिए विशाल भवनों और विद्युत उपकेंद्रों की जरूरत होती है। इसके लिए पर्याप्त भूमि का चयन करना होता है। यदि कृषि भूमि या ग्रामीण इलाकों का उपयोग किया जाता है तो स्थानीय लोगों की आजीविका और पर्यावरण से जुड़े प्रश्न सामने आते हैं। भारत में कुछ प्रस्तावित परियोजनाओं को लेकर भूमि अधिग्रहण और संसाधनों पर दबाव की चिंताएं सामने आ चुकी हैं।
जल संकट और शीतलन प्रणालियों की चुनौती
आंकड़ा केंद्रों में बड़ी संख्या में उपकरण लगातार काम करते हैं और उनसे अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है। उपकरणों को सुरक्षित तापमान पर रखने के लिए पानी की आवश्यकता वाली शीतलन व्यवस्था जरूरी होती है। विश्व संसाधन संस्थान के अनुसार भारत के आधे से अधिक आंकड़ा केंद्र ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं जहां जल संकट का स्तर चिंताजनक है। देश के अनेक हिस्से पहले से भूजल के गिरते स्तर से जूझ रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर बिजली और पानी की बढ़ती मांग
दुनिया के अनेक देशों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित आंकड़ा केंद्रों के लिए बिजली और पानी की मांग तेजी से बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय से जुड़े शोध के आधार पर यह अनुमान है कि वर्ष 2030 तक खपत वर्तमान स्तर से काफी बढ़ सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पर्यावरणीय प्रभाव को केवल कार्बन उत्सर्जन के आधार पर नहीं समझा जा सकता। भूमि और जल की खपत को भी समान महत्व देना आवश्यक है।
बिजली की मांग और कार्बन उत्सर्जन की समस्या
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए सामान्य डिजिटल सेवाओं की तुलना में कहीं अधिक संगणन क्षमता की आवश्यकता होती है। हजारों उपकरणों को चलाने और ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में बिजली चाहिए। यदि यह बिजली कोयला या अन्य जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोतों से आती है तो आंकड़ा केंद्रों का अप्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन बढ़ सकता है। इसलिए आंकड़ा केंद्रों को नवीकरणीय ऊर्जा से जोड़ने पर चर्चा हो रही है।
यूरोपीय देशों के नियम और भारत सरकार का रुख
यूरोपीय आयोग ने ऐसे आंकड़ा केंद्रों के लिए ऊर्जा और जल दक्षता से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने के नए नियम प्रस्तावित किए हैं। भारत में पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार ऐसी परियोजनाओं की जांच में जल की उपलब्धता और पुनर्चक्रण जैसे पहलुओं पर विचार किया जाता है। डिजिटल विकास की जरूरत और प्राकृतिक संसाधनों की सीमाओं के बीच संतुलन बनाना भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है।
भविष्य की नीतियां और संसाधनों का सही उपयोग
सबसे आवश्यक है कि आंकड़ा केंद्र स्थापित करने से पहले स्थान का समग्र मूल्यांकन किया जाए। जहां जल संकट गंभीर हो वहां कम पानी वाली शीतलन तकनीकों को बढ़ावा दिया जा सकता है। निवेश आकर्षित करने के साथ पर्यावरणीय मानकों को समान महत्व देने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण की जरूरत है। तकनीकी विस्तार प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर नहीं होना चाहिए।