प्रशासनिक करुणा अब ड्राई फ्रूट्स में पैक होकर आती है: सूखे की समीक्षा बैठक में सजे काजू-बादाम और किसानों का विरोध

प्रशासनिक करुणा अब ड्राई फ्रूट्स में पैक होकर आती है और यह प्रथा का एक नया रूप बन गई है। नांदेड़ (महाराष्ट्र) की सूखे की समीक्षा बैठक में मेज पर सजे काजू-बादाम ने सूखे की तस्वीर को एक प्लेट में साफ दिखा दिया। एक ओर खेत था, जहाँ सोयाबीन जैसी फसलें पानी के इंतजार में सूख रही थीं। दूसरी ओर वातानुकूलित कक्ष था, जहाँ सूखे की समीक्षा के बीच काजू-बादाम सजाए गए थे।
लोकतंत्र की नई परिभाषा और कैमरे में कैद विरोधाभास
काजू और बादाम अब केवल मेवे नहीं रहे बल्कि वे लोकतंत्र की नई शब्दावली बन गए हैं। वे निर्दोष थे क्योंकि न तो उन्हें सूखे का पता था और न ही किसान की परेशानी का। मामला यहीं खत्म नहीं हुआ और कैमरे ने वह दिखा दिया जो सरकारी रिपोर्टें अक्सर नहीं दिखा पाती हैं। सांसद के हाथ का काजू कैमरे में आया और सोशल मीडिया पर खेत से भी तेज गति से फैल गया। किसान की सूखी फसल खबर नहीं बनी बल्कि काजू मुख्य खबर बन गया।
हिंगोली में किसान का अनोखा विरोध और पत्ते पर मेवे
नांदेड़ बैठक के बाद हिंगोली में एक किसान ने पत्ते पर काजू-बादाम रखकर कृषि मंत्री को पेश किए जिससे विरोध की भाषा पूरी तरह बदल गई। यह कोई भेंट नहीं थी बल्कि व्यवस्था को उसका अपना स्वाद लौटाया गया था। किसान ने कहा कि लीजिए साहब, बैठक में जो खाया था, वही खेत से उठाकर आपके सामने रख रहे हैं। पत्ते पर रखे मेवे कम और सवाल ज्यादा थे कि जब आपकी मेज पर काजू है, तो हमारे खेत में पानी क्यों नहीं पहुंच रहा है।
आपदा का मेन्यू और प्रशासनिक संवेदना
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी कवायद को व्यवस्था ने प्रथा कहकर समेट दिया है। आपदाओं की समीक्षा बैठकों में अक्सर नाश्ते का इंतजाम होता है मानो हर आपदा का अपना एक तय मेन्यू हो। किसान के घर चूल्हा ठंडा पड़े तो वह संकट होता है लेकिन बैठक में नाश्ता ठंडा हो जाए तो वह प्रशासनिक असुविधा बन जाती है। व्यवस्था अपनी बैठक में काजू खाकर और किसान खेत में पसीना बहाकर राष्ट्रनिर्माण में जुटे रहने का दावा करते हैं। असली दूरी काजू और किसान के बीच नहीं है बल्कि वह दूरी बैठक की मेज और सूखे हुए खेत के बीच की है।